इण्टीग्रेटिव मेडिसिन समय की माँग – डॉ अशोक वार्ष्णेय

आयुर्वेद एवं पाश्चात्य विधा का समन्वय चिकित्सा की सफलता का मूल मंत्र- डॉ जी एस तोमर


गुरु गोरक्षनाथ इन्स्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़, महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय गोरखपुर द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस आरोग्य संगम 2025 के वैज्ञानिक सत्र की अध्यक्षता आरोग्य भारती के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं विश्व आयुर्वेद मिशन के संस्थापक अध्यक्ष प्रो.(डॉ.) जी एस तोमर ने की । इस सत्र में आत्रेय इनोवेशन के संस्थापक डॉ अनिरुद्ध जोशी ने “टेक्नोलॉजी इंटीग्रेशन इन डायग्नोसिस पल्स मोनीटर (नाड़ी तरंगिणी) के विशिष्ट परिप्रेक्ष्य में” विषय पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया । डॉ जोशी ने नाड़ी परीक्षा को व्यावहारिक, सरल एवं वैज्ञानिक स्वरूप में विकसित करने का सफल प्रयास किया है । इससे पारम्परिक ज्ञान को नवाचार के माध्यम से चिकित्सोपयोगी बनाया जा सकता है । दूसरा प्रस्तुतीकरण सेन्टर फॉर रुमेटिक डिसीजेज के डाइरेक्टर एण्ड चीफ रुमेटोलॉजिस्ट डॉ अरविन्द चोपरा ने “इन्टीग्रेटिव मेडिसिन क्लिनिकल बेस्ड एप्रोच” विषय पर दिया । डॉ चोपरा ने जोड़ों के दर्द की विभिन्न विकृतियों को अत्यंत सरल एवं वैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत किया । उनका प्रस्तुतिकरण चिकित्सकों को रुमेटिक डिसीजेज के सही निदान एवं चिकित्सा में अत्यंत लाभकारी साबित होगा। आयुर्वेद एवं पाश्चात्य चिकित्सा विधा किस प्रकार सम्मिलित रूप से इन रोगियों को स्वास्थ्य लाभ पहुँचा सकती है इस पर अपने विचार साझा किए ।डॉ राजेन्द्र जैन ने स्वर विज्ञान के आधार पर इडा, पिंगला एवं सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से स्वास्थ्य संरक्षण, संवर्धन एवं रोग उपचार पर अपने अनुभव साझा किए । सत्राध्यक्ष के रूप में अपने उद्बोधन में डॉ तोमर ने तीनों ही विद्वान वक्ताओं को उनके उत्कृष्ट प्रस्तुतीकरण के लिए बधाई दी एवं बताया कि नाड़ी परीक्षा आयुर्वेदीय निदान पद्धति की अष्ट स्थान परीक्षा का एक महत्वपूर्ण भाग है । उन्होंने कहा कि योगरत्नाकर नामक आयुर्वेदीय ग्रंथ में नाड़ी, मूत्र, मल, जिह्वा, शब्द, स्पर्श, दृक् एवं आकृति अष्टविध रोगी परीक्षा का वर्णन है जो सम्पूर्ण निदान को अपने आप में समाहित करता है । इस ज्ञान को आज की विकसित तकनीक के प्रयास से नवाचार करना समय की आवश्यकता है । वहीं रुमेटिक डिसीजेज के सम्बन्ध में अपने विचार रखते हुए उन्होंने बताया कि हज़ारों वर्ष पूर्व महर्षि चरक ने वातव्याधि एवं वातरक्त के संदर्भ में इस महत्वपूर्ण रोग विशेष की जानकारी प्रस्तुत की है । यही नहीं विकास के क्रम में माधवकार ने माधव निदान में आमवात का वर्णन कर इस रोग को और अधिक विस्तार दिया है ।चिकित्सा विज्ञान के विकसित परीक्षणों के आधार पर इसका प्रस्तुतिकरण चिकित्सकों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा । उन्होंने इन्टीग्रेटिव मेडिसिन के सम्बन्ध में अपने विचार साझा करते हुए कहा कि हर विधा की अच्छाइयों को समाविष्ट कर रोगी को आदर्श चिकित्सा उपलब्ध कराना ही इसका मूलभूत उद्देश्य होना चाहिए । ट्रीटमेंट गैप को भरने के लिए अन्य प्रभावी विधाओं का चिकित्सा में समावेश ही सफल इण्टीग्रेशन हो सकता है । डॉ तोमर ने अपने उद्बोधन में जीवनशैली जन्य विकारों के उपचार में आयुर्वेद को अत्यंत प्रभावी बताया । उन्होंने कहा कि आयुर्वेद न केवल स्वास्थ्य संरक्षण के लिए उत्कृष्ट विधा है अपितु जीर्ण एवं कष्ट साध्य रोगों के लिए भी संजीवनी है ।
द्वितीय वैज्ञानिक सत्र की अध्यक्षता आरोग्य भारती के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ अशोक कुमार वार्ष्णेय ने की । इस सत्र डॉ पवन गोदातवर, पद्मश्री डॉ मनोरंजन साहू एवं डॉ जी एस तोमर ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए । सत्राध्य़क्ष के रूप में अपने उद्बोधन में उन्होंने तीनों विद्वान प्रस्तोताओं को उनके उत्कृष्ट प्रस्तुतिकरण के लिए बधाई दी एवं इण्टीग्रेशन को समय की माँग बताया । इस अन्तर्राष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस में सात देशों के एवं ग्यारह प्रदेशों के लोगों ने प्रतिभाग किया ।

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